उपयोगिता क्या है? (उपयोगिया का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं, मापन एवं प्रकार, गणनात्मक उपयोगिता, क्रमवाचक उपयोगिता), सीमांत उपयोगिता एवं कुल उपयोगिता में संबंध (Utility meaning in hindi, upyogita in hindi, Utility in economics in hindi)
अर्थशास्त्र में उपयोगिता का अर्थ उस तृप्ति या संतुष्टि से है जो किसी व्यक्ति को किसी वस्तु या सेवा का उपभोग करने से प्राप्त होती है। यह एक मानसिक अनुभव है जो व्यक्ति विशेष के आधार पर अलग अलग हो सकता है। एक ही वस्तु एक व्यक्ति को अधिक संतोष दे सकती है जबकि वही वस्तु किसी अन्य व्यक्ति के लिए अनुपयोगी हो सकती है।
उपयोगिता वह शक्ति है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति की आवश्यकता विशेष की पूर्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से की जा सकती है। अर्थशास्त्र में उपयोगिता से तात्पर्य (upyogita se tatparya) किसी वस्तु या सेवा की आवश्यकता पूर्ति की शक्ति से होता है। चाहे वस्तु लाभदायक हो या हानिकारक हो।
उदाहरणार्थ, शराब का सेवन सामान्य व्यक्ति के लिए हानिकारक होता है, परन्तु एक शराबी के लिए शराब की उपयोगिता ज़्यादा होती है। क्योंकि इससे उसकी आवश्यकता की पूर्ति होती है। यानि कि शराबी के लिए शराब की उपयोगिता होती है। जबकि सामान्य व्यक्ति के लिए शराब की कोई उपयोगिता नहीं होती।
अनुक्रम (Table of Contents) :3.1. गणनावाचक उपयोगिता3.2. क्रमवाचक उपयोगिता5.1. सीमांत उपयोगिता5.1.1. सीमांत उपयोगिता के रूप5.2. कुल उपयोगिता
उपयोगिता का अर्थ (meaning of utility)
उपयोगिता किसी वस्तु या सेवा का वह गुण है जिससे उपभोक्ता को उसके उपभोग से संतुष्टि या तृप्ति प्राप्त होती है। मानवीय आवश्यकताओं की संतुष्टि वस्तुओं एवं सेवाओं के उपभोग से होती है। जब आप भूखे होते हैं तब रोटी के सेवन से आपको संतुष्टि प्राप्त होती है। इसे ही उस रोटी की उपयोगिता (upyogita) कहा जाता है। लेकिन यदि आपका पेट भर चुका हो तब अगली रोटी की उपयोगिता आपके लिए कम हो जाती है।
उपयोगिता से अभिप्राय (upyogita se abhipray) किसी वस्तु की आवश्यकता को संतुष्ट करने की शक्ति से होता है। संक्षेप में, उपयोगिता, वस्तु या सेवा के उस गुण या शक्ति को संबोधित करती है जो मानवीय आवश्यकता को संतुष्ट करती है। सामान्य तौर पर यह उपभोक्ता की पसंद, ज़रूरत और उसकी परिस्थिति पर निर्भर करती है। साथ ही आर्थिक निर्णयों का आधार बनती है जैसे मांग और मूल्य निर्धारण।
जॉन रॉबिंसन के अनुसार - "किसी वस्तु की उपयोगिता उस वस्तु का वह गुण है जिसके कारण कोई व्यक्ति इन्हें ख़रीदना चाहते हैं। वस्तुओं को ख़रीदने की यही इच्छा उस वस्तु की उपयोगिता कहलाती है।"
प्रो. हॉब्सन के अनुसार - "उपयोगिता एक वस्तु की आवश्यकता को संतुष्ट करने की योग्यता है।"
प्रो. बाघ के अनुसार - "मानवीय आवश्यकताओं को संतुष्ट करने की क्षमता को ही उपयोगिता कहा जाता है।"
उपयोगिता की विशेषताएँ (Characteristics of Utility)
उपयोगिता की प्रमुख विशेषताएं (upyogita ki visheshtayen) निम्नलिखित होती हैं-
(1) उपयोगिता एक आत्मनिष्ठ धारणा है-
उपयोगिता किसी वस्तु का निजी गुण नहीं है। यह एक मनोवैज्ञानिक धारणा है जो वस्तु के उपभोक्ता की मानसिक स्थिति पर निर्भर होती है। एक ही वस्तु से दो अलग-अलग मानसिक स्थितियों में भिन्न-भिन्न उपयोगिता प्राप्त हो सकती है।
उदाहरणार्थ, किसी एक व्यक्ति को गुलाबी रंग की शर्ट पहनकर अत्यधिक सन्तुष्टि का अनुभव होता है। तो वहीं गुलाबी शर्ट किसी दूसरे व्यक्ति को बिल्कुल भी पसन्द न हो। दरअसल उपयोगिता व्यक्ति की इच्छा, रुचि, आदत, फैशन, वातावरण आदि पर निर्भर करती है।
(2) उपयोगिता को लाभदायकता के साथ समानीत नहीं किया जा सकता-
किसी वस्तु की उपयोगिता और उस वस्तु से होने वाला लाभ। ये दोनों ही अलग-अलग पहलू हैं। हो सकता है कोई वस्तु लाभदायक न हो, किंतु किसी व्यक्ति विशेष के लिए उसमें उपयोगिता हो। उदाहरणार्थ, सिगरेट का उपभोग भले ही लाभदायक न हो, लेकिन सिगरेट के उपभोक्ताओं की दृष्टि से सिगरेट बेहद उपयोगी है।
(3) उपयोगिता का नैतिकता से कोई सम्बन्ध नहीं-
कुछ वस्तुओं का उपभोग करना सामाजिक मान्यताओं के अनुसार अनैतिक होता है या कानूनी दृष्टि से ग़लत, किन्तु आर्थिक दृष्टि से विक्रेताओं और संतुष्टि की दृष्टि से देखा जाए तो उपभोक्ताओं के लिए उन वस्तुओं की उपयोगिता होती है। उदाहरणार्थ, भारत में शराब के उपयोग की साधारणतः निन्दा की जाती है। निसंदेह शराब का सेवन अनैतिक माना जाता है। किंतु शराबी के नज़रिए से देखा जाए तो उसके लिए शराब की विशेष उपयोगिता होती है।
4) उपयोगिता अमूर्त होती है-
किसी भी वस्तु विशेष की उपयोगिता का कोई भौतिक स्वरूप नहीं होता है। उसे न तो देखा जा सकता है और न ही स्पर्श किया जा सकता है। किसी भी वस्तु विशेष की उपयोगिता को केवल महसूस किया जा सकता है।
5. वास्तविक उपभोग पर निर्भर नहीं-
सामान्यतः उपयोगिता वास्तविक उपभोग पर निर्भर नहीं होती। उपयोगिता किसी वस्तु की संतुष्टि प्रदान करने की क्षमता होती है।
6. उपयोगिता आवश्यकता की तीव्रता पर निर्भर करती है-
सभी वस्तुएँ सभी व्यक्तियों के लिए हर समय समान रूप से उपयोगी नहीं होती हैं। यह उस व्यक्ति की आवश्यकता की तीव्रता पर निर्भर करती है। उदाहरणार्थ, पानी एक प्यासे व्यक्ति के लिए उपयोगी है परन्तु उस व्यक्ति के लिए नहीं, जो कि प्यासा नहीं है।
7. उपयोगिता स्थान, व्यक्ति व परिस्थिति पर निर्भर करती है-
किसी वस्तु की उपयोगिता समय, स्थान, व्यक्ति और परिस्थिति के अनुसार अलग अलग होती है।
8. उपयोगिता धनात्मक या ऋणात्मक हो सकती है-
वस्तु की मात्रा के उपयोग में अधिकतम संतुष्टि धनात्मक तथा उसके बाद ऋणात्मक उपयोगिता मिलती है।
उपयोगिता की माप (Measurement of Utility)
किसी वस्तु की उपयोगिता उसके आंतरिक गुणों पर निर्भर नहीं करती है। यह एक मनोवैज्ञानिक धारणा है जो व्यक्ति, समय व स्थान के साथ साथ बदलती रहती है।
उपयोगिता की माप (upyogita ki map) के संबंध में दो दृष्टिकोण मिलते हैं -
1. गणनावाचक दृष्टिकोण
2. क्रमवाचक दृष्टिकोण।
1. गणनावाचक दृष्टिकोण (Ganavachak upyogita) -
इस दृष्टिकोण का विचार मार्शल, वालरस तथा पीगू आदि के द्वारा दिया गया। मार्शल पहले अर्थशास्त्री थे जिन्होंने उपयोगिता को मुद्रा रूपी पैमाने से मापने का सुझाव दिया। इनके अनुसार जिस प्रकार दूध को लीटर से, कपड़े को मीटर से मापा जा सकता है उसी प्रकार उपयोगिया को मुद्रा से मापा जा सकता है।
गणनावाचक तथा क्रमवाचक दृष्टिकोण के अंतर्गत लिए प्रयोग में लाए गए शब्द गणित से लिए गए हैं। गणित में 1, 2, 3, 4, इत्यादि संख्याओं को गणनात्मक संख्याएँ कहा जाता है। इन समस्त संख्याओं एक निश्चित आकार होता है जिस कारण विभिन्न संख्याओं की तुलना एक-दूसरे से की जा सकती है।
अर्थात इन्होंने मुद्रा को उपयोगिता का मापक माना है। किसी वस्तु की एक इकाई ख़रीदने के लिए व्यक्ति जितनी मुद्रा का त्याग को तैयार होता है। वह राशि उस वस्तु की उपयोगिता कहलाती है। उदाहरणार्थ : एक छात्र एक पेन के लिए ₹10 देने के लिए तैयार है तो उसके लिए उस पेन की उपयोगिता ₹10 है।
2. क्रमवाचक दृष्टिकोण (kramvachak upyogita) -
इस दृष्टिकोण का विचार आधुनिक अर्थशास्त्री हिक्स, ऐलन, स्लटस्की आदि के द्वारा दिया गया। इनके अनुसार उपयोगिता की माप सम्भव नहीं है। यानि कि उपयोगिता को मुद्रा रूपी पैमाने से नहीं मापा जा सकता। इन अर्थशास्त्रियों के अनुसार, उपभोक्ता उन वस्तुओं को उनकी उपयोगिता के आधार पर क्रम में रख सकता है। अर्थात जो वस्तु सबसे ज़्यादा उपयोगिता रखती है उसे प्रथम तथा द्वितीय स्थान पर उससे कम उपयोगिता रखने वाली वस्तु को रखा जा सकता है।
इसी तरह अन्य वस्तुओं का क्रम, उनकी उपयोगिता के आधार पर रखा जा सकता है। क्रमवाचक दृष्टिकोण के अंतर्गत हम यह तो कह सकते हैं कि कोई व्यक्ति केले की तुलना में सेब का उपभोग करना ज़्यादा पसन्द करता है, यानि कि उसकी नज़र में केले की तुलना में सेब की उपयोगिता अधिक है। किन्तु इस उपयोगिता की मात्रा कितनी होगी, यह बता पाना सम्भव नहीं है।
गणनावाचक उपयोगिता की मान्यताएं
गणनावाचक उपयोगिता की मान्यताएं निम्नलिखित हैं--
1. मार्शल, गणनावाचक उपयोगिया को योगात्मक मानते हैं जिसका अर्थ है कि विभिन्न वस्तुओं से प्राप्त उपयोगिता को जोड़ कर क्रय की गई वस्तुओं के उपभोग से प्राप्त कुल उपयोगिता को प्राप्त किया जा सकता है।
2. मुद्रा की सीमांत उपयोगिता सदैव स्थित रहती है।
3. उपभोक्ता अपनी उपयोगिता को अधिकतम करना चाहता है।
4. वस्तु के उपभोग से प्राप्त उपयोगिता का परिमाणात्मक माप संभव है और इसको गणनात्मक संख्याओं में व्यक्त किया जा सकता है।
5. उपयोगिता स्वतंत्र होती है अर्थात किसी वस्तु का उपभोग करने वाले व्यक्ति को उस वस्तु से जो उपयोगिता प्राप्त होती है वह पूर्णतया उस वस्तु की मात्रा पर निर्भर होती है।
उपयोगिता के प्रकार (Types of Utility)
उपयोगिता दो प्रकार की होती है-
(1) सीमान्त उपयोगिता (Marginal utility)
(2) कुल उपयोगिता (Total utility)
(1) सीमान्त उपयोगिता (Marginal utility)
किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग से जो अतिरिक्त उपयोगिता मिलती है, उसे सीमांत उपयोगिता (simant upyogita) कहते हैं। दूसरे शब्दों में, हम उस अतिरिक्त सन्तुष्टि को सीमांत उपयोगिता कह सकते हैं जो किसी व्यक्ति को उसकी पसंदीदा वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई का उपभोग करने से प्राप्त होती है।
प्रो. बोल्डिंग के अनुसार, "एक वस्तु की किसी मात्रा की सीमान्त उपयोगिता, कुल उपयोगिता में होने वाली वह वृद्धि है जो उपभोग में एक इकाई बढ़ने के परिणामस्वरूप प्राप्त होती है।"
उदाहरणार्थ, किसी वस्तु की एक इकाई का उपभोग करने पर यदि कुल उपयोगिता 40 (यूटिल्स) है और दूसरी इकाई का उपभोग करने पर कुल उपयोगिता बढ़कर 70 (यूटिल्स) हो जाती है
तो दूसरी (एक अतिरिक्त) इकाई की सीमान्त उपयोगिता : 70-40 = 30 होगी।
सूत्र : सीमांत उपयोगिता (n वीं इकाई) = कुल उपयोगिता (n) - कुल उपयोगिता (n-1)
सीमांत उपयोगिता के रूप -
(1) धनात्मक उपयोगिता - जब किसी वस्तु के उपभोग से उपभोक्ता को संतुष्टि मिलती है। तो उसे धनात्मक सीमांत उपयोगिता कहा जाता है। यह उपयोगिता किसी वस्तु के उपभोग से शून्य सीमांत उपयोगिता प्राप्त होने से पहले की स्थिति होती है।
(2) शून्य उपयोगिता - जब वस्तु का उपभोग करने से संतुष्टि के स्तर में कोई परिवर्तन नहीं होता है यानि कि वस्तु के उपभोग से न तो कुल उपयोगिता बढ़ती और न घटती है। तो उसे शून्य सीमांत उपयोगिता कहा जाता है। इसे पूर्ण तृप्ति (संतुष्टि) का बिंदु भी कहा जाता है। सामान्यतया यह सीमांत इकाई होती है।
(3) ऋणात्मक उपयोगिता - जब किसी वस्तु के प्रयोग से असंतुष्टि मिलती है तो इसे ऋणात्मक सीमांत उपयोगिता की अवस्था कहा जाता है। अर्थात जब किसी वस्तु की अगली इकाई के उपभोग से कुल उपयोगिता कम हो जाए तो इस इकाई से ऋणात्मक उपयोगिता प्राप्त होती है।
(2) कुल उपयोगिता (Total utility)
वस्तु की सभी इकाइयों के उपभोग से उपभोक्ता को जो उपयोगिता प्राप्त होती है उसे कुल उपयोगिता (kul upyogita) कहते हैं। दूसरे शब्दों में, वस्तु की उपभोग की गई सब इकाइयों से प्राप्त उपयोगिताओं के जोड़ को कुल उपयोगिता कहा जाता है। अर्थात कुल उपयोगिता, उपभोग की विभिन्न इकाइयों से प्राप्त सीमांत उपयोगिता का योग होता है।
प्रो. मेयर्स के अनुसार, "कुल उपयोगिता किसी वस्तु की अतिरिक्त (उत्तरोत्तर) इकाइयों के उपभोग से प्राप्त सीमांत उपयोगिताओं का योग होती है।"
यदि किसी वस्तु की पहली इकाई का उपभोग करने से 10 इकाई (यूटिल) की संतुष्टि तथा दूसरी इकाई से 9 इकाई (यूटिल) की संतुष्टि होती है। तो कुल उपयोगिता 10+9=19 यूटिल होगी।
सूत्र : कुल उपयोगिता = समस्त सीमांत उपयोगिता का योगफल
सीमांत उपयोगिता एवं कुल उपयोगिता का रेखाचित्र द्वारा स्पष्टीकरण
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| कुल उपयोगिता एवं सीमांत उपयोगिता |
रेखाचित्र में दिखाए गए भाग A में कुल उपयोगिता वक्र को Tu से दर्शाया गया है। जहां स्पष्ट हो रहा है कि कुल उपयोगिता बिंदु A तक घटती हुई दर से बढ़ रही है। तथा A बिंदु पर पहुंचकर अधिकतम हो जाती है तो कुल कुल उपयोगिता घटने लगती है।
रेखाचित्र में दिखाए गए भाग B में सीमांत उपयोगिता वक्र को Mu से दर्शाया गया है। जिसकी ढाल ऋणात्मक है। अर्थात जैसे जैसे उपभोक्ता द्वारा वस्तु की अधिकाधिक इकाइयों का उपयोग किया जाता है वैसे वैसे कुल उपयोगिता तो बढ़ती है लेकिन सीमांत उपयोगिता कम होती चली जाती है।
रेखाचित्र के दोनों भागों को देखकर आप आसानी से समझ सकते हैं कि जब उस वस्तु की कुल उपयोगिता A बिंदु पर अधिकतम होती है, तब उसकी सीमांत उपयोगिता शून्य अर्थात X अक्ष पर चली जाती है। अब यदि इसके बाद भी वस्तु के उपभोग की मात्रा को बढ़ाया जाता है तो निश्चित रूप से सीमांत उपयोगिता ऋणात्मक अर्थात X अक्ष के नीचे की ओर चली जाती है। अर्थात कुल उपयोगिता भी घटने लगती है।
सीमान्त उपयोगिता तथा कुल उपयोगिता में सम्बन्ध (Relation between Marginal utility and total utility in hindi)
कुल उपयोगिता तथा सीमांत उपयोगिता के बीच संबंध को निम्न तालिका एवं रेखाचित्र द्वारा आसानी से समझ जा सकता है -
उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर कुल उपयोगिता तथा सीमान्त उपयोगिता में सम्बन्ध (kul upyogita aur simant upyogita mein sambandh) निम्नानुसार स्थापित किया जा सकता है-
(1) जब तक सीमांत उपयोगिता धनात्मक है कुल उपयोगिता में वृद्धि होती है। तालिका व रेखाचित्र के अनुसार AB के विस्तार के बीच सीमांत उपयोगिता कम हो रही है लेकिन धनात्मक है। अतः कुल उपयोगिता घटती दर से बढ़ रही है।
(2) जब सीमांत उपयोगिता शून्य (0) है तब कुल उपयोगिता अधिकतम दिखाई दे रही है। रेखाचित्र में B बिंदु पर MU=0 और TU पर बिंदु C है जहां कुल उपयोगिता अधिकतम है।
(3) जब सीमांत उपयोगिता ऋणात्मक होती है (शून्य से कम) तो कुल उपयोगिता कम होना प्रारंभ कर देती है।
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