सीमांत उपयोगिता क्या है? | सीमांत उपयोगिता का महत्व, मान्यताएं तथा आलोचनाएं क्या हैं?
सीमांत उपयोगिता (MU) कुल उपयोगिता में वह परिवर्तन है जो वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग से होता है। अर्थात किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उपभोग से जो अतिरिक्त उपयोगिता मिलती है, उसे सीमांत उपयोगिता (simant upyogita) कहते हैं।
दूसरे शब्दों में, "सीमांत उपयोगिता उस अतिरिक्त संतुष्टि को बताती है जो कि उपभोक्ता को वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई का उपभोग करने से प्राप्त होती है।"
सीमांत उपयोगिता का महत्व (Importance of Marginal Utility in hindi)
सीमांत उपयोगिता अर्थशास्त्र का आधार स्तंभ है क्योंकि सभी महत्वपूर्ण निर्णय इसी आधार पर लिए जाते हैं। सीमांत उपयोगिता के महत्व (simant upyogita ke mahatva) निम्न है -
1. उपभोग के क्षेत्र में सभी मुख्य नियम सीमांत उपयोगिता विश्लेषण पर आधारित हैं जैसे सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम, सम-सीमांत उपयोगिता नियम, मांग का नियम, उपभोक्ता की बचत आदि।
2. क़ीमत निर्धारण में सीमांत उपयोगिता के आधार पर ही क़ीमत का निर्धारण होता है। कोई भी उपभोक्ता किसी वस्तु का मूल्य उसकी सीमांत उपयोगिता से अधिक नहीं देता है अर्थात किसी वस्तु की क़ीमत उसकी सीमांत उपयोगिता के बराबर होती है। इस प्रकार कीमत किसी वस्तु की सीमांत उपयोगिता को मापती है।
3. उत्पादन के क्षेत्र में प्रत्येक उत्पादक लाभ को अधिकतम तथा लागत को न्यूनतम करना चाहता है। उत्पादक अपने उत्पादन के लिए न्यूनतम लागत तभी प्राप्त कर सकता है जबकि वह उत्पादन के साधनों को ऐसे क्रम में लगाए जहां पर साधन की सीमांत उत्पादकता में अंतर बराबर रहे।
सीमांत उपयोगिता की मान्यताएं (Assumptions of Marginal Utility in hindi)
सीमांत उपयोगिता निम्न मान्यताओं के आधार पर कार्य करती है -
1. उपभोग की जानेवाली सभी इकाइयों में एकरूपता होनी चाहिए।
2. विश्लेषण यह मानकर चलता है कि उपभोक्ता एक विवेकशील प्राणी है, वह सोच समझकर निर्णय लेता है।
3. यह विश्लेषण मांग व पूर्ति में निरंतरता को लेकर चलता है।
4. किसी समय विशेष पर उपभोक्ता की आय स्थिर होती है।
5. किसी समय विशेष पर उपभोक्ता की आवश्यकताओं में परिवर्तन नहीं होना चाहिए।
6. यह विश्लेषण इस मान्यता पर आधारित है कि मुद्रा की सीमांत उपयोगिता स्थिर होती है।
सीमांत उपयोगिता की आलोचनाऐं (Criticisms of Marginal Utility in hindi)
कुछ अर्थशास्त्रियों ने सीमांत उपयोगिता की कटु आलोचना की है। उनके अनुसार उपयोगिता एक सैद्धांतिक शब्द है। इसकी आलोचना में उपस्थित तर्क निम्न हैं -
1. सीमांत उपयोगिता विश्लेषण अवास्तविक मान्यताओं पर आधारित है।
2. सभी वस्तुएं समरूप नहीं होती हैं।
3. उपयोगिता एक मनोवैज्ञानिक विषय है, जिसकी माप संभव नहीं है।
4. वास्तविक जीवन में उपभोक्ता सदैव विवेकपूर्ण ढंग से कार्य नहीं करता है। वह आंतरिक एवं बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित होता है तथा उस पर रीति रिवाज व भावनाओं का प्रभाव रहता है।
5. मांग व पूर्ति की निरंतरता मूल्य में परिवर्तन से भंग होती है। अर्थात मूल्य में परिवर्तन से मांग व पूर्ति में भी परिवर्तन होता है।
6. वास्तविक जीवन में न व्यक्ति की आय और न ही आवश्यकताएं स्थिर होती हैं अर्थात समय के साथ-साथ परिवर्तित होती रहती हैं।
7. सीमांत विश्लेषण व्यक्तिगत दृष्टिकोण का अध्ययन करता है परंतु दिन प्रतिदिन व्यापक अर्थशास्त्र का महत्व बढ़ता जा रहा है। संपूर्ण समाज की समस्याओं का समाधान करने के लिए यह विश्लेषण उपयोगी सिद्ध नहीं होता है।
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