आगमन एवं निगमन विधि : अर्थ, परिभाषा, सोपान, रूप, गुण एवं दोष
प्रत्येक विज्ञान अपने नियमों एवं सिद्धांतों के निर्माण हेतु कुछ निश्चित विधियों को अपनाता है। अर्थशास्त्र भी एक विज्ञान है। अतः यह भी अपने नियमों एवं सिद्धांतों हेतु कुछ विधियों का अनुसरण करता है। इस अंक में हम आर्थिक अन्वेषण के लिए प्रयोग में लायी जाने वाली दो विषयों के बारे में जानने वाले हैं।
अर्थशास्त्र में आगमन (Induction) एवं निगमन (Deduction) विधि दोनों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। ये दोनों शोध, सिद्धांत निर्माण और आर्थिक नीतियों के निर्धारण की आधारभूत विधियाँ हैं। आइए विस्तार से समझते हैं।
Tablet of contents :
अर्थशास्त्र में आगमन विधि एवं निगमन विधि (Inductive & Deductive method in economics in hindi)
सामान्यतः आर्थिक अन्वेषण में अर्थशास्त्र में दो विधियों का उपयोग किया जाता है -
(1) आगमन विधि (Inductive Method) एवं
(2) निगमन विधि (Deductive Method)
(1) आगमन विधि (Inductive Method in hindi)
आगमन विधि में हम विशिष्ट से सामान्य की ओर जाते हैं। उदाहरण पहले देखते हैं उसके बाद में नियम या सिद्धांतों तक पहुंचते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो आगमन विधि के द्वारा हम किसी आर्थिक घटना के बारे में या इतिहास के अध्ययन से या अपने पर्यवेक्षण द्वारा अनेक तथ्य एकत्र करते हैं और फ़िर उन तथ्यों के आधार पर सामान्य सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हैं।
आगमन विधि की परिभाषा– आगमन विधि वह पद्धति है जिसमें हम विशेष तथ्यों और घटनाओं का अध्ययन करके एक सामान्य नियम या सिद्धांत तक पहुँचते हैं। यानि कि छोटे-छोटे उदाहरणों से सामान्य निष्कर्ष पर पहुंचते हैं।
उदाहरण :
हमने देखा कि सूरज रोज़ पूर्व से उगता है।
कई दिनों तक हमने यह देखा कि हर बार सूरज पूर्व से ही उगता है।
निष्कर्ष ~ "सूरज हमेशा पूर्व से उगता है।"
आगमन विधि के तीन सूत्र :
1. ज्ञात से अज्ञात की ओर
2. विशिष्ट से सामान्य की ओर
3. स्थल से सूक्ष्म की ओर
आगमन विधि के रूप (Forms of inductive method in hindi)
आगमन विधि के सामान्यतः दो रूप होते हैं -
(1) परीक्षणात्मक रूप (Experimentation) एवं (2) साख्यिकीय रूप (Statistical form)।
(1) परीक्षणात्मक रूप (Experimentation)-
इसके अंतर्गत वास्तविक तथ्यों का अध्ययन करके उन नियमों की सत्यता का परीक्षण किया जाता है जिनका निर्माण निगमन विधि के द्वारा किया गया है।
(2) साख्यिकीय रूप (Statistical form)-
आगमन विधि के सांख्यिकीय रूप के अंतर्गत राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था के विभिन्न खंडों से संबंधित तथ्यों का संग्रह करके उनके आधार पर आर्थिक सिद्धांतों एवं नियमों का निर्माण किया जाता है। दूसरे शब्दों में, इस विधि के अंतर्गत हम विशिष्ट से सामान्य की ओर जाते हैं।
आगमन विधि का सांख्यिकीय रूप इसके परीक्षणात्मक रूप से अधिक महत्वपूर्ण है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अर्थशास्त्र में परीक्षण प्रणाली की उपेक्षा की जा सकती है।
सामाजिक एवं भौतिक विज्ञानों के कई महत्वपूर्ण नियमों का निर्माण आगमन विधि द्वारा किया गया है। इस संदर्भ में ऐंजिल के उपभोग-नियम का उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। इस आर्थिक नियम का निर्माण प्रत्यक्षतः सांख्यिकीय विधि द्वारा किया गया है। आगमन विधि आर्थिक नियमों की सापेक्षता के महत्व पर भी बल देती है।
आगमन विधि के सोपान | आगमन विधि के चरण
आगमन विधि में किसी तथ्य या सिद्धांत तक पहुँचने के लिए हम विशेष (particular) घटनाओं या उदाहरणों से सामान्य (general) नियम बनाते हैं। इसे विशेष से सामान्य की ओर जाने की विधि भी कहते हैं। इसके सोपान (Steps of inductive method in hindi) निम्नलिखित हैं -
1. समस्या या प्रश्न का चयन
सबसे पहले किसी विषय, समस्या या प्रश्न को चुन लिया जाता है, जिसे समझना या सिद्ध करना हो। हम इतिहास के अध्ययन तथा अपने पर्यवेक्षण द्वारा तथ्यों को एकत्र करते हैं।
2. अवलोकन (Observation)
एकत्र करने के बाद चुनी हुई समस्या से संबंधित घटनाओं, वस्तुओं या तथ्यों का ध्यानपूर्वक परीक्षण किया जाता है। इसके बाद उन तथ्यों का वैज्ञानिक वर्गीकरण करके उनसे सामान्य निष्कर्ष निकाला जाता है।
3. परिक्षण और प्रयोग (Experimentation)
विभिन्न उदाहरणों का परीक्षण और प्रयोग करके उनके परिणामों को समझा जाता है। इन निकाले हुए निष्कर्षों की सत्यता की पुनः तथ्यों द्वारा जांच करते हैं।
4. समानताओं एवं भिन्नताओं का अध्ययन (Comparison & Analysis)
प्राप्त परिणामों की आपस में तुलना करके उनमें समानताएँ और भिन्नताएँ ढूँढी जाती हैं।
5. नियम या सामान्यीकरण (Generalization)
जब बार-बार एक जैसी स्थिति और परिणाम सामने आते हैं, तो उससे एक सामान्य नियम या सिद्धांत तैयार किया जाता है।
6. सत्यापन (Verification)
बनाए गए नियम या निष्कर्ष को अन्य परिस्थितियों और उदाहरणों पर लागू करके जाँचा जाता है। यदि हर बार वही परिणाम मिलते हैं, तो नियम की पुष्टि हो जाती है।
👉 संक्षेप में :
विशेष उदाहरण → अवलोकन → प्रयोग → तुलना → सामान्यीकरण → सत्यापन = आगमन विधि
आगमन विधि के गुण | आगमन विधि की विशेषताएं
आगमन विधि में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं-
1. निष्कर्षों का वास्तविक होना -
अवलोकन एवं प्रयोग के आधार पर विशिष्ट आर्थिक घटनाओं एवं तथ्यों से निकाले गए निष्कर्ष वास्तविकता के अधिक निकट होते हैं।
2. निष्कर्षों की जांच संभव है -
इस विधि के अंतर्गत निकाले गए निष्कर्षों की सत्यता की जांच प्रयोगों एवं अन्य तथ्यों द्वारा की जा सकती है।
3. यह वैज्ञानिक विधि है -
यह एक प्रावैगिक विधि है। आर्थिक परिस्थितियों की जटिलता को बताती है तथा इनमें होने वाले परिवर्तन की प्रवृत्ति को स्वीकार करती है।
4. व्यापक अर्थशास्त्र के लिए उपयोगी -
इस विधि में व्यापक आर्थिक विषय जैसे राष्ट्रीय आय, पूर्ण रोजगार, कुल मांग आदि का अध्ययन किया जाता है।
5. निगमन विधि की पूरक -
इस विधि द्वारा निगम विधि के समान ही सत्य की वास्तविकता एवं यथार्थता की जांच अवलोकन एवं प्रयोग द्वारा की जा सकती है।
आगमन विधि के दोष | आगमन विधि की सीमाएं
इसमें संदेह नहीं कि आगमन विधि में अनेक गुण पाये जाते हैं, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि इसमें कुछ त्रुटियां भी हैं। जो निम्नलिखित हैं-
1. यह विधि अत्यंत कठिन व ख़र्चीली है। तथ्यों का संग्रह स्वयं एक कठिन कार्य है क्योंकि आर्थिक जगत बहुत ही जटिल है।
2. इस विधि में पक्षपापूर्ण निष्कर्षों की संभावना अधिक होती है।
3. इसका क्षेत्र सीमित है और यह सर्वव्यापक विधि नहीं है। अकेले आगमन विधि से ही काम नहीं चलेगा जब तक कि निगमन विधि द्वारा इसकी आपूर्ति न की जाए।
4. केवल आगमन विधि से किसी भी विषय का विकास नहीं किया जा सकता। अन्वेषणकर्ता को सैद्धांतिक अर्थशास्त्र का भी पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।
5. नियंत्रित प्रयोग न होने के कारण एकत्रित सूचनाओं तथा आंकड़ों के अपर्याप्त होने पर उनसे निकाले गए निष्कर्ष के सत्य एवं शुद्ध होने की अधिक या कम संभावना हो सकती है।
(2) निगमन विधि (Deductive Method in hidi)
वास्तविक संसार जटिलताओं और उलझनों से भरा है इसलिए हम शुरुआत सरल मान्यताओं से करते है। फिर धीरे-धीरे जटिल मान्यताओं को अध्ययन में शामिल करते है जिससे वास्तविकता तक पहुंच सके।अतः अध्ययन का क्रम सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है।
उपयोगिता ह्रास नियम के अनुसार जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु की अधिकाधिक इकाइयों का उपभोग करता है, तो प्रत्येक अगली इकाई से प्राप्त होने वाली उपयोगिता गिरती चली जाती है। वास्तव में, यह एक स्वयंसिद्ध सत्य है। इसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। निगमन तर्क-विधि की सहायता से हम इस स्वयंसिद्ध नियम से कई प्रकार के उपनियम निकाल सकते हैं।
इस उपनियम के अनुसार मुद्रा की एक निश्चित मात्रा से ग़रीबों की अपेक्षा अमीरों को कम उपयोगिता प्राप्त होती है। फिर इस उपनियम से एक अन्य उपनियम स्वतः ही निकलता है। वह यह है कि लोगों पर कराधान, आनुपातिक आधार पर न लगाया जाए। यदि कराधान आनुपातिक आधार पर लगता है अर्थात प्रत्येक व्यक्ति अपनी आय का एक निश्चित प्रतिशत कराधान के रूप में सरकार को देता है तो इससे निश्चय ही अमीरों पर कर-भार कम और गरीबों पर अधिक होगा।
निगमन विधि की परिभाषा– निगमन विधि वह पद्धति है जिसमें हम पहले से बने हुए सामान्य नियमों या सिद्धांतों के आधार पर विशेष निष्कर्ष निकालते हैं।यानि कि सामान्य से विशेष की ओर बढ़ते हैं।
उदाहरण :
सामान्य नियम: "सभी मनुष्य नश्वर हैं।"
विशेष तथ्य: "अरस्तु एक मनुष्य है।"
निष्कर्ष → "अरस्तु नश्वर है।"
विधि के तीन सूत्र :
1. अज्ञात से ज्ञात की ओर
2. सामान्य से विशिष्ट की ओर
3. सूक्ष्म से स्थूल की ओर
निगमन विधि के रूप (Forms of the deductive method in hindi)
निगमन विधि दो प्रकार की होती है -
1. गणितीय विधि
2. अगणितीय विधि
1. गणितीय विधि- इस विधि का प्रयोग 19वीं शताब्दी में एजबर्थ ने किया था बाद में प्रो. हिक्स ने इस विधि का प्रयोग किया। गणितीय विधि अर्थशास्त्र के अध्ययन का प्रमुख अंग है।
2. अगणितीय विधि- अगणितीय विधि का प्रयोग परंपरावादी अर्थशास्त्रियों द्वारा किया गया है। वे गणितीय विधियों का प्रयोग नहीं करते।
निगमन विधि के सोपान | निगमन विधि के चरण
निगमन विधि (Deductive Method) एक ऐसी तार्किक पद्धति है जिसमें सामान्य सिद्धांतों, नियमों या तथ्यों से विशेष निष्कर्ष निकाले जाते हैं। इसमें विचार-प्रक्रिया सामान्य से विशेष की ओर चलती है। इस विधि के चरण (Steps of Deductive Method in hindi) निम्न हैं -
1. सामान्य सिद्धांत या नियम का चयन
सबसे पहले किसी सामान्य नियम, तथ्य या सिद्धांत को आधार बनाया जाता है। यह सिद्धांत पहले से प्रमाणित या स्वीकृत होता है।
2. विशेष परिस्थिति में नियम का प्रयोग
चुने हुए सामान्य नियम को किसी विशेष घटना, परिस्थिति या उदाहरण पर लागू किया जाता है।
3. तार्किक विश्लेषण (Logical Reasoning)
नियम और परिस्थिति के आधार पर तर्क किया जाता है तथा निष्कर्ष निकालने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
4. विशेष निष्कर्ष प्राप्त करना
विशेष घटना, परिस्थिति या उदाहरणों पर लागू किए गए सामान्य नियम से किसी विशेष निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है जो कि तार्किक और वैज्ञानिक होता है।
निगमन विधि के गुण | निगमन विधि की विशेषताएं
निगमन विधि में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं-
1. सरलता- इसके अंतर्गत हम सामान्य परिस्थितियों या घटनाओं या मान्यताओं को लेकर निगमन विधि का प्रयोग कर तर्क की सहायता से वास्तविकता की ओर बढ़ते हैं।
2. निश्चितता- यह वास्तविक जगत के निकट है अतः इसके निष्कर्ष सही, शुद्ध, स्पष्ट एवं सुनिचित होते हैं। गणित का उपयोग करने पर अज्ञात का अनुमान लगाना सरल हो जाता है।
3. सर्वव्यापकता- इस विधि द्वारा बनाए गए सिद्धांत सभी देशें व सभी कालों में लागू होते हैं। अध्यापक इस विधि का ज़्यादा प्रयोग करते हैं।
4. निष्पक्षता- इसके अंतर्गत एक सामान्य सत्य के आधार पर विशिष्ट निष्कर्ष निकाले जाते हैं अतः इस पर व्यक्तिगत विचारों एवं दृष्टिकोणों का प्रभाव नहीं पड़ता है।
5. आगमन विधि की पूरक- निगमन विधि द्वारा आगमन विधि के बनाए सिद्धांतों की सत्यता की जांच की जा सकती है।
6. भविष्यवाणी- इसके आधार पर घटनाओं के अनुमान लगाए जा सकते हैं। इसके निष्कर्ष निश्चित (certain) होते हैं बशर्ते नियम सही हों।
निगमन विधि के दोष | निगमन विधि की सीमाएं
निगमन विधि का उपयोग यदि सावधानी पूर्वक किया जाए तथा प्रायः निश्चित एवं स्पष्ट निष्कर्ष प्राप्त हो सकते हैं। परंतु इस विधि में कुछ कमियां भी है जो निम्नलिखित हैं-
1. अवास्तविकता- इस विधि की सबसे बड़ी कमी यह है कि जिस सामान्य मान्यता को लेकर हम चले हैं यदि वह ही अवास्तविक है तो निकाले गए निष्कर्ष भी अवास्तविक एवं दोषपूर्व होंगे।
2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं- वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न नहीं हो पाता है। निगमन विधि द्वारा स्थैतिक दशा का वर्णन किया जाता है प्रावैगिक का नहीं।
3. रटने की प्रवृत्ति का होना - निगमन विधि से विद्यार्थियों में रटने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है जो कि भविष्य के लिए सही नहीं है।
4. पूर्ण ज्ञान की कमी - प्रारंभ में ही नियमों या सूत्रों को रटने की वजह से, छात्रों को नियमों या सूत्रों का ज्ञान तभी तक रहता है जब तक उन्हें वे नियम या सूत्र याद रहते हैं।
5. अमूर्त चिंतन पर अधिक बल - यह विधि केवल छात्रों के अमूर्त चिंतन पर ही ज़्यादा ज़ोर देती है। जिस कारण छात्रों की रचनात्मक सकती को बढ़ावा नहीं मिल पाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
आगमन विधि एवं निगमन विधि एक दूसरे के संपूरक हैं। क्योंकि अर्थशास्त्र में दोनों ही विधियां उपयुक्त हैं।
प्रो. डरबिन के अनुसार, "अपने आप में तो तथ्य कुछ नहीं बताते। यदि इनसे कुछ अर्थ निकालना है तो हमें उनका विश्लेषण, उपकल्पना एवं उनकी तुलना करनी चाहिए तभी उनसे कुछ अर्थ निकल सकेगा।"
वास्तविकता तो यह है कि निगमन विधि अनुभवजन्य अथवा आगमन विधि केवल एक वर्णनात्मक विधि बनकर ही रह जाती है। इस बात की आशंका है कि यदि हम आगमन विधि को निगमन विधि से पूर्णतः पृथक कर देते हैं तो हमारे पास एक-दूसरे से संबंधित तथ्यों का ढेर लग जाएगा। यह आर्थिक विज्ञान की प्रगति के हित में नहीं होगा।
अब अर्थशास्त्रियों में इस विषय पर सामान्य सहमति पायी जाती है कि आर्थिक विश्लेषण एवं अनुशासन के लिए दोनों विधियों का समुचित सम्मिश्रण कर दिया जाए। न तो अकेले आगमन और न ही अकेले निगमन विधि से काम चलेगा। इसलिए आगमन विधि और निगमन विधि (aagman vidhi aur nigman vidhi) को एक-दूसरे का प्रतियोगी न मानकर, साझेदार ही समझना चाहिए। उनके कथनानुसार, "हमें आशा करनी चाहिए कि ये दोनों विधियां सदैव बनी रहेंगी और एक-दूसरे की सहायता करती रहेंगी।"
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