उपभोक्ता संतुलन क्या है? | उपभोक्ता संतुलन की मान्यताएं बताइए | उपभोक्ता संतुलन की शर्तें क्या हैं?

उपभोक्ता का संतुलन 

माँग का सिद्धांत उपभोक्ता के व्यवहार का विश्लेषण करके उपभोक्ता के संतुलन को स्थापित करने में मदद करता है। एक उपभोक्ता सीमित साधनों से अपनी असीमित आवश्यकताओं की पूर्ति इस ढंग से करना चाहता है कि उसे अधिकतम संतुष्टि की प्राप्ति हो सके। जब उपभोक्ता अधिकतम संतुष्टि प्राप्त कर लेता है तब वह संतुलन की स्थिति में कहलाता है। इस दशा में उपभोक्ता यही चाहता है कि उसके व्यय करने के ढंग में कोई परिवर्तन ना हो।

अनुक्रम 👇

• उपभोक्ता संतुलन का अर्थ। 
• तटस्थता वक्र विश्लेषण के अंतर्गत उपभोक्ता संतुलन। 
• उपभोक्ता संतुलन की मान्यताएँ। 
• उपभोक्ता संतुलन की शर्तें। 


उपभोक्ता के संतुलन का अर्थ (meaning of consumer's equilibrium in hindi)

उपभोक्ता संतुलन से तात्पर्य यह है कि "उपभोक्ता अपनी आय किस प्रकार व्यय करके अपने लिए अधिकतम संतुष्टि प्राप्त करता है। इस प्रकार एक उपभोक्ता, संतुलन की स्थिति में उस समय होता है जब वह अपनी सीमित आय को विभिन्न वस्तुओं पर इस प्रकार व्यय करे की उसे अधिकतम संतुष्टि प्राप्त हो।"

शब्दों में एक उपभोक्ता, संतुलन की स्थिति में तब माना जाता है जब उसको, अपनी आय के प्रयोग से अधिकतम संतुष्टि प्राप्त होने लगती है।


तटस्थता वक्र विश्लेषण के अंतर्गत उपभोक्ता संतुलन (Consumer's equilibrium under indifference curve analysis in hindi)

उपभोक्ता संतुलन की दशा को तटस्थता वक्र विश्लेषण के द्वारा भी ज्ञात किया जा सकता है। तटस्थता वक्र विश्लेषण पद्धति क्रमवाचक उपयोगिता पर आधारित है। 

तटस्थता वक्र विश्लेषण पद्धति के द्वारा उपभोक्ता का संतुलन (Upbhokta ka santulan) ज्ञात करने के लिए हमें दो बातों की जानकारी होना आवश्यक है।

(1) तटस्थता मानचित्र
(2) क़ीमत या बजट रेखा।

(1) तटस्थता मानचित्र- तटस्थता मानचित्र का मालूम होना इसलिए आवश्यक है ताकि उपभोक्ता अपनी संतुष्टि को अधिकतम करते समय सर्वाधिक ऊँचे स्तर अर्थात तटस्थता वक्र का चयन कर सके। परंतु सर्वाधिक ऊँचे स्तर पर पहुँचते समय उपभोक्ता को अपनी आय तथा वस्तुओं की कीमतों को भी ध्यान में रखना होता है। अतः उपभोक्ता के संतुलन के लिए क़ीमत रेखा का मालूम होना भी आवश्यक है। 



(2) क़ीमत या बजट रेखा- क़ीमत या बजट रेखा दो वस्तुओं के विभिन्न संयोगों को बताती है जो की उपभोक्ता वस्तुओं की क़ीमतों के आधार पर अपनी निश्चित आय से ख़रीद सकता है।

आइये हम इसे इस उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं। उम्मीद है आप उपभोक्ता संतुलन (upbhokta santulan) को अच्छी तरह समझ सकेंगे।




मान लीजिए उपभोक्ता के पास ₹ 10 हैं। इन ₹ 10 को यह उपभोक्ता दो वस्तुओं संतरे और सेब पर विभिन्न प्रकार से ख़र्च कर सकता है। उपभोक्ता या तो एक वस्तु पर अधिक तथा दूसरी वस्तु पर कम ख़र्च कर सकता है। अथवा दूरी स्थिति यह भी हो सकती है कि वह अपने ₹ 10 को संतरों पर ही ख़र्च कर दे तथा सेब एक भी न ख़रीदे। इस दशा में वह केवल संतरे की OA मात्रा ख़रीदेगा। जैसा कि हमने चित्र में दर्शाया है। ठीक इसी तरह यह भी हो सकता है कि वह अपने ₹ 10 को संतरों पर बिल्कुल भी ख़र्च न करे बल्कि सम्पूर्ण ₹ 10 को सेबों पर ही व्यय करे। इस स्थिति में वह सब की OB मात्रा ख़रीदेगा। जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है। यदि इन्हीं दोनों सिरों A और B को मिला दिया तो हमें रेखा AB प्राप्त होगी जो कि बजट रेखा या कीमत रेखा कहलाएगी। 

यदि सेब तथा संतरों की कीमतें स्थिर रहें तथा उपभोक्ता की मौद्रिक आय बढ़ जाये तो नई क़ीमत रेखा दाएं खिसककर A1B1 हो जाएगी। क्योंकि उपभोक्ता अब अपनी आय से दोनों ही वस्तुओं की अधिक मात्रा को ख़रीदने में सक्षम है। 

इसके विपरीत यदि उपभोक्ता की मौद्रिक आय में कमी हो जाये जबकि दोनों ही वस्तुओं की कीमतें स्थिर हैं। तो नई क़ीमत रेखा बाएं खिसककर A2B2 हो जाएगी। क्योंकि उपभोक्ता अपनी कम आय घटने की वजह से दोनों वस्तुओं की कम मात्रा ही ख़रीद पायेगा।

चलिये अब ज़रा दूसरी परिस्थिति पर बात करते हैं। जब उपभोक्ता की आय स्थिर हो। तथा दोनों में से केवल किसी एक वस्तु की क़ीमत में परिवर्तन हो। यानि कि किसी एक वस्तु की क़ीमत स्थिर हो।


तब आप चित्र में देखेंगे कि क़ीमत रेखा का एक सिरा तो स्थिर रहे परंतु दूसरा सिरा दाएं या बाएं, उस वस्तु की क़ीमत में परिवर्तन होने के परिणामस्वरूप खिसक जाए। उदाहरण से समझें तो यदि उपभोक्ता की आय तथा किसी एक वस्तु यानि स्थिर रहे तथा किसी एक वस्तु यानि कि सेब की क़ीमत में कमी आ जाये तो क़ीमत रेखा AB का B सिरा दाएं खिसक जाएगा। जिससे कीमत रेखा AB1 हो जाएगी। 

इसके विपरीत यदि यदि सेब की कीमत में उछाल आ जाये यानि कि बढ़ जाए तो क़ीमत रेखा AB का B सिरा बाएं खिसककर B2 हो जाएगा। जिससे कि नई क़ीमत रेखा AB2 बन जाएगी। 

इस प्रकार तटस्थता मानचित्र तथा क़ीमत या बजट रेखा के आधार पर पता कर सकते हैं कि उपभोक्ता का संतुलन क्या है?


उपभोक्ता संतुलन की मान्यताएं | assumptions of consumer's equilibrium in hindi

उपभोक्ता के संतुलन से जुड़ी कुछ विशेष मान्यताएं (upbhokta santulan ki manyataen) भी हैं जो कि निम्नलिखित हैं-

(1) इसकी विशेष मान्यता यह है कि उपभोक्ता का प्राथमिकता का क्रम जिसे कि तटस्थता मानचित्र प्रदर्शित करता है। वह स्थिर रहता है।

(2) उपभोक्ता के लिए एक दी हुई आय है। जिसका वह केवल इन्हीं दो वस्तुओं पर व्यय करता है।

(3) वस्तुओं की दी हुई क़ीमतें स्थिर रहती हैं।

(4) वस्तुओं की सभी इकाइयां एकरुप हैं। तथा सभी विभाज्यनीय हैं। 

(5) उपभोक्ता अपनी संतुष्टि को अधिकतम करना चाहता है जहाँ कि उसका व्यवहार विवेकपूर्ण है।  

उपभोक्ता संतुलन की शर्तें | Conditions of Consumer's Equilibrium in hindi

एक उपभोक्ता, संतुलन की स्थिति में तभी हो सकता जब कुछ विशेष दशाएँ पूर्ण हों। अर्थात उपभोक्ता को अपने लिए संतुलन की स्थिति पाने के लिए कुछ शर्तें होती हैं। आइये उपभोक्ता संतुलन की शर्तें क्या हैं? (Upbhokta Santulan ki sharte) जानते हैं- 

(1) उपभोक्ता का संतुलन उस बिंदु पर होगा जहाँ क़ीमत रेखा तटस्थता वक्र को स्पर्श करती हुई होती है।

(2) स्पर्श बिंदु पर कीमत रेखा का ढाल तटस्थता वक्र के ढाल के बराबर रहता है। 

(3) संतुलन बिंदु पर सीमान्त प्रतिस्थापन दर घटती हुई होनी चाहिए। यानि कि संतुलन बिंदु पर तटस्थता वक्र रेखा मुलबिन्दु के प्रति उन्नतोदर होनी चाहिए।

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